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जल पुनर्भरण के परंपरागत स्रोत: जोहड़




जोहड़ वर्षा जल संरक्षण की एक परम्परागत संरचना है। जोहड़ मतलब एक प्रकार का तालाब जिसमें चारों दिशाओं से बरसाती पानी इकट्ठा हो जाए और उसका किसी तरफ़ से भी निकास न हो। इन जोहड़ों को कच्चा तालाब, बरसाती तालाब, जूहड़, झील, पोखर या डबरा की संज्ञा भी दी जा सकती है। प्राचीन काल से ही इनका उपयोग कई कार्यों में होता आया है जैसे सिंचाई, पशुओं व मनुष्यों के नहाने, धोने, पीने इत्यादि में। मत्स्य पालन में भी इसका उपयोग होता है। इनका सबसे बड़ा फायदा यह है कि ये धरती के जल को निरंतर रिचार्ज करता रहते हैं।

 मतलब कि जोहड़ भू – जल का पुनर्भरण करते हैं। पहले के जमाने में गांवों में जोहड़ होते थे, लेकिन वर्तमान में लोगों ने जोहड़ को भुला दिया है जिससे जलसंकट उत्पन्न हो गया है। आज हमारे गांवों में भी विरले ही कुछेक जोहड़ बचे हुए हैं। आज जोहड़ों के पुनरूद्धार की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित श्री राजेन्द्र सिंह जी ने 1985 में राजस्थान के अलवर जिले से जोहड़ों के पुनर्निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया, जिसके फलस्वरूप जहां-जहां पर जोहड़ के निर्माण का कार्य आरम्भ किया गया वहां-वहां पर जलसंकट के समाधान के साथ-साथ ही बहुत-सी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को भी कम किया गया। आज जल संकट एक बड़ी समस्या है। जल के अंधाधुंध दोहन,मनुष्य की लापरवाही के कारण आज जल का स्तर निरंतर गिरता चला जा रहा है।


 भूमिगत जल या तो बहुत ही गहरा है या तो भूमिगत जल की उपलब्धता आज जोहड़ों के न होने के कारण बहुत ही कम हो गई है। जोहड़ जल संरक्षण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते आएं हैं, लेकिन आज जल संकट के कारण बहुत-सी सामाजिक-आर्थिक समस्याएं लगातार जन्म ले रही हैं। हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि समाज व सभ्यता के विकास में जल का बड़ा महत्व है। जल की समस्या का समाधान करने के लिए सभी व्यक्तियों को मिलजुल कर प्रयास करने होंगे एवं जल संरक्षण के परम्परागत तरीकों (जोहड़ आदि) को पुनर्जीवित करना होगा। 


मानवीय सभ्यता और संस्कृति के उद्गम के साथ ही पानी संग्रह करने के लिए जोहड़ बनाना प्रारंभ हुआ था। जोहड़ हमारे देश भारत में ही नहीं , बल्कि पूरे विश्व के हर देश में बनाए जाते रहे हैं , लेकिन भारतीय संस्कृति में इनका महत्व अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक रहा है । वास्तव में प्राचीनकाल में जोहड़ वर्षा जल को संग्रहित करने के लिए धरातल पर बनाया गया एक कच्चा अर्ध-चंद्राकर स्ट्रक्चर होता है जो वर्षा जल के संग्रह के साथ ही पीने के पानी की भी पूर्ति करता है। एक जोहड़ भूगर्भ जल स्तर को बनाये रखता है , यह वनस्पति को जीवित रखता है और वन्य जीव-जंतुओं/ प्राणियों के लिए जल की पूर्ति करता है। भारत के प्रत्येक गांव में इन जोहड़ों का निर्माण हजारों हजारों वर्षों से चला आ रहा है।


 वास्तव में, देखा जाए तो पालतू पशुओं के साथ साथ वन्य प्राणियों के लिए भी पानी की उपलब्धता हो सके, इसके लिए जोहड़ का निर्माण हमारे देश की एक सनातन परंपरा रही है।पहले के जमाने में अक्सर खेतों, गोचर भूमि या ओरण में जोहड़ का निर्माण उन स्थानों पर किया जाता था, या होता था जहाँ मिट्टी में जिप्सम की अधिकता हो जो जल को लम्बे समय तक जमीन में रिस कर नीचे जाने से रोके रखने में भी सक्षम हो। रेगिस्तान में बालू टीलों के बीच जिप्सम के इन मैदानों के मध्य में बनाये गए मिट्टी के गहरे गड्ढे में बारिश की हरेक बून्द को करीने से सुरक्षित किया जाता रहा है।जल ही जीवन है शायद इसीलिए इन स्थानों को मंदिरों की तरह हमेशा से आदर भाव से देखा गया, जिनका लाभ हम इंसानों, पशुओं एवं वन्यजीवों सभी ने भरपूर रूप से उठाया है। 


जोहड़ को पहले पवित्र स्थान मानते थे और यही कारण था कि समाज का हर एक व्यक्ति इससे जुड़े अलिखित संरक्षण के नियमों का बखूबी पालन भी करता था, जिसमें जोहड़ जैसे स्थानों में शौच आदि न जाना, यहाँ की मिट्टी को अन्यत्र नहीं ले जाना शामिल है। पहले के जमाने में जोहड़ पायतान में मृत पशु डालने का कार्य नहीं किया जाता था और, जोहड़ में नहाने से रोका जाता था,ताकि वह प्रदूषित न हो।पहले वर्षा आने से पहले इन जोहड़ों की साफ -सफाई की जाती थी, यहाँ उपस्थित झाड़-झंकाड़,खरपतवार व अन्य फालतू वनस्पति को मिलजुलकर कर हटाया जाता था, मिट्टी को समतल भी किया जाता था ताकि बरसाती पानी कहीं रूके नहीं और एक स्थान विशेष पर सलीके से एकत्रित होता रहे। 


धीरे धीरे इन कच्चे जोहड़ों को पक्का भी बनाया जाने लगा,इनका पुनरुत्थान, पुनरूद्धार किया जाने लगा। आज भी राजस्थान के अनेक गांवों में पक्के जोहड़ देखने को मिल जायेंगे। वास्तव में,  ये पक्के जोहड़ ही आज भी हमारे देश के शानदार इतिहास की एक झलक दिखाते है। बताया चलूँ कि पहले कुछ जोहड़ वर्गाकार आकृति के होते थे जिनमें चारो कोनों पर सुंदर गुम्बद वाली छतरियां और हर ओर मध्य में पानी तक जाने के रास्ते होते थे। कच्चे जोहड़ में अधिकतम छह माह तक और पक्के जोहड़ में

बारह मास तक पीने का शुद्ध और मीठा पानी संरक्षित रखा जा सकता था। बताता चलूँ कि पक्के जोहड़ सीढ़ीनुमा गहराई में होते हैं, गहराई के साथ पानी के अलग अलग सीढ़ी नुमा तल को चौपड़ कहते हैं। जोहड़ की बाहरी सीमा ऊंची बनाई जाती है, ताकि  पशु आदि  उसे गन्दा नहीं करें। पालतू पशु और वन्य जीवों के पानी पीने के लिए, जोहड़ से जुड़ा हुआ एक अलग से स्थान बनाया जाता था,  जिसे गऊघाट कहते हैं। पहले विभिन्न सामाजिक संगठन,संस्थाएं, गांव की पंचायत, पंच-सरपंच और व्यक्ति विभिन्न आवश्यकताओं के मद्देनजर जोहड़ निर्माण किया करते थे । 



राजस्थान के चूरू,बीकानेर, झुंझुनूं, सीकर, नागौर शेखावाटी इलाकों में आज भी अनेक जोहड़ देखने को मिल जायेंगे। आज जोहड़ों के जल ग्रहण की जमीन को आवंटित कर इसमें भवन निर्माण भी कर दिये गये हैं एवं कई और विभाग इस श्रंखला में लगे हैं। जोहड़ों के स्थान पर कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। मनरेगा में भी जोहड़ों पर पहले की तुलना में कम ध्यान दिया जा रहा है, पुनरूद्धार नहीं होने के कारण जोहड़ परंपरा अब समाप्त प्रायः सी हो गई है। कानूनन जोहड़ पायतान में किसी भी तरह के निर्माण  की इजाजत नहीं है, लेकिन यह धड़ल्ले से हो रहा है, यही कारण है कि आज जोहड़ों की संख्या में लगातार गिरावट आई है। पुराने जोहड़ आज अनुपयोगी हो चले हैं, बजट का अभाव है। जल संरक्षण की ओर किसी का ध्यान नहीं है। पहले के जमाने में जोहड़ निर्माण में शत प्रतिशत जन सहयोग होता था। भामाशाह, बड़े उधोगपति तक अपना योगदान देते थे। सेठ साहूकारों के साथ ही आमजन धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत होकर जोहड़ों के लिए श्रमदान करते थे। यही कारण था कि भारत के अनेक गांवों में जोहड़ बहुतायत संख्या में बने। जल संरक्षण में इन जोहड़ों ने महती भूमिका निभाई। पहले महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी ( नरेगा ) कार्यक्रम के तहत भी जोहड़ों के पुनरूद्धार के लिए काफी काम होता था, आज जोहड़ों की ओर किसी का ध्यान नहीं है। धीरे धीरे जोहड़ परंपरा लुप्त होती जा रही है।


 आज जोहड़ों को बचाने के लिए हमें समाज के पूर्व अनुभवों को प्रयोग में लेना अति आवश्यक है । इसमें दो राय नहीं कि आज समाज को जोहड़ों की आवश्यकता है, क्योंकि जल की समस्या बड़ी विकट है । आज मीठे पानी के स्रोत खत्म होते जा रहे हैं , वर्षा जल का संरक्षण सही तरीकों से नहीं हो पा रहा है। भूगर्भिक जल स्तर लगातार गिर रहा है , वनस्पतियां नष्ट हो रहीं हैं। मानव , वन्य जीव , पशु पक्षियों के लिए पानी हर मौसम में समस्या बनता जा रहा है। गांवों में पहले से बने जोहड़ों पर आज अतिक्रमण हो गया है। गांवों की आबादी लगातार बढ़ने के कारण यह हुआ है। जोहड़ निर्माण के लिए वर्तमान में गांवों में जगह का अभाव हो गया है। ऐसी स्थिति में आज समाज में जाग्रति लाकर जोहडों को अतिक्रमण से मुक्त कर उनके पुनः निर्माण की अति आवश्यकता है। 


आज वर्षा जल एकत्रण के लिए न तो टांकें ही बचे हैं और न ही जोहड़। प्राचीनकाल से जोहड़ हमारे देश के गांवों- ढाणियों, कस्बों और शहरों को मीठे जल की पूर्ति करते रहे हैं। वर्षा जल संग्रहण के ये परंपरागत जल स्रोत हैं। अकाल, दुकाल, त्रिकाल में ये हमेशा जल से भरे रहे हैं और जीव-जगत के जीवन के कहीं न कहीं आधार रहे हैं। हमें चाहिए कि हम इनका जीर्णोद्धार/पुनरूद्धार करें, इन्हें उपयोगी बनायें, जिससे जल संग्रहण हो सके। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जोहड़ों के चारों ओर पीपल और बरगद जैसे पौधों और वनस्पतियों का विकास भी होता है, जो कि प्राणी जगत के लिए ऑक्सीजन के बड़े स्रोत हैं। हमें चाहिए कि हम परम्परागत जल स्रोत जोहड़ों का हर हाल और परिस्थितियों में संरक्षण करें और मानवजाति ही नहीं संपूर्ण प्राणी जगत के विकास में योगदान दें।