Header Ads Widget


 

किसका खेला किसका खदेड़ा...!(व्यंग्य रचना)

 चुनावी मौसम जारी है। सभी दल दल, दल बदल चुनाव चुनाव खेल रहे हैं। खेल ये बड़ा हिट है और ये चुनावी दल इसमें सब तरह और सब तरफ से फिट हैं। हर तरफ खेल से "खेला" हो रहा है। क्योंकि खेल अब खेला बना दिया गया है। यह "खेला" नेताजी द्वारा प्रायोजित है। इस खेला का सारा का सारा दारोमदार हमारे नेताजी पर ही है। इसलिए नेताजी कुर्सी पर बैठकर यह "खेला" खेल रहे हैं, जनता बेचारी आंख मीचकर और जाड़ भींचकर इस "खेला" को देख रही है, और घोषणाओं के इस खेला को देखकर अपना "वोट सोट" मेरा मतलब "रूपया" फेंक रही हैं। अजी ! वोट ही तो नोट है। 

जनता सोच रही है, घोषणाओं का खेला उनके लिए फ्री में उपलब्ध है, लेकिन वास्तव में फ्री कुछ भी नहीं है। इस घोषणा में टैक्स है, लगा इन पर "वैक्स" है, जनता फिसल जाती है और वोट(पैसा) लुटाती है। नेताजी इस खेला को देखने दिखाने के लिए फ्री के नाम पर जनता को बुलाते हैं, बरगलाते हैं, और फिर "वोट" डलवाते हैं, अजी माफ करिएगा वोट नहीं "पैसा"। जनता नाच रही है। नाच जनता नाच,तुझे कैसी है आंच ? भोली जनता को नेता तू अपने जाल(खेला) में फांस। ओ हो ! मैं भी ना क्या क्या बकता रहता हूँ। मुझे भी नेताओं की तरह

खेला में वोट ही वोट दिखाई देता है। पैसे को वोट बोल रहा हूँ। दिमाग खराब हो गया है। खैर जो भी हो, जनता खुश हैं, बागमबाग है, जनता का दिल वोट फेंक फेंक कर, मतलब पैसा फेंक फेंक कर दिल और दिमाग दोनों  गार्डन गार्डन हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें राजनीति के इतिहास में पहली बार इतना बड़ा "खेला" करने वाला बड़ा और पहुंच वाला चमत्कारी नेता मिला है। पहले के जमाने में तो पहुंच वाले कोई संत या बाबाजी ही हुआ करते थे। आजकल समय बदल चुका है। आज नेताजी ही पहुंच वाले हैं। बाबाजी, संतों का खेल खेत्म हो चुका है। नेता आ गए हैं, जनता को भा गए हैं और हर तरफ छा गए हैं। आज नेताजी की डुगडुगी बॉक्स ऑफिस पर हिट चल रही है। तोताराम जी बोले डुगडुगी का करतब दिखाने वाला मदारी जिस प्रकार से भरे बाजार के बीच डुगडुगी बजाता है, तमाशा दिखाता है ( जनता के बीच खेला करता है), लोगों को हंसाता है, गुदगुदाता है, उसमें सारा का सारा योगदान मदारी का होता है, क्योंकि मदारी डुगडुगी बजाकर "भाषणबाजी" अच्छी करता है और बात-बात पर जनता को(खेला देखने वालों को) कहता है-" आइए मेहरबानों, आइए कद्रदानों..."। जनता को बस भाषणपिलाई चाहिए, भाषणपिलाई से वह मोगेंबो से भी अधिक खुश हो जाती है और बिना सोचे समझे अपना सर्वस्व लुटाती है।

 भाषणपिलाई करके चाहे आप जनता के पास फूटी कौड़ी तक भी मत छोड़ो। सबकुछ लूट लो। खैर, हमें इससे क्या लेना देना है। हम तो आपको डुगडुगी वाले के बारे में जानकारी दे रहे थे, वो क्या है कि डुगडुगी में बंदर तो बस उसके(मदारी के) इशारों पर नाचता मात्र है। जनता बेचारी बहक जाती है और टकटकी लगाकर "खेला" देखती रहती है, डुगडुगी वाला बस बातों का रस घोलता है, और बेचारी जनता खेला स्थल से एक कदम भी पीछे नहीं हटती। आज "खेला" दिखाने के लिए स्वयं नेताजी कुर्सी पर जमकर सजकर बैठे हैं, वे सूटेड बूटेड हैं, वे कुर्सी से टस से मस नहीं होना चाहते हैं, वो क्या है कि कुर्सी के "खेला" में " हिंडौले" अच्छे आते हैं, ऐशो आराम वाली रिवोल्विंग चेयर है। भाषणपिलाई करते रहो और कुर्सी पर जमे रहो। खूब आनंद की अनुभूति हो रही है। कुर्सी पर बैठकर वे कुछ भी अंट शंट बकते रहो, क्योंकि कुर्सी कुछ भी अंट शंट बकने की ताकत देती है। ये जो "खेला और खदेड़ा" है, वो बस कुर्सी का "होबे" है। कुर्सी वाला उछल उछल कर कहता फिरता है, हमारे राज में प्रदेश विकास कर रहा है, यह बात अलग है कि बेचारे "विकास" को अपने "चहुंमुखी विकास" की जानकारी ही नहीं है। "विकास" मुंह बाये अवाक खड़ा है, सोच रहा है कि ये "विकास" कब हो गया ?, कैसे हो गया ? यदि हो गया तो मुझे इसके बारे में पता क्यों नहीं चला वगैरह वगैरह। खेला चल रहा है, नेता दूसरे नेता को खेला दिखाकर उसका खदेड़ा कर रहा है। वह विकास विकास चिल्लाता है। स्टेज पर खेला दिखाते हुए बका जा रहा है -विकास हुआ है और विकास के कारण लोगों को काम पर काम मिल रहा है, किसानों को उनकी फसलों की वाजिब कीमत मिल रही है। नौजवानों के पास रोजगार है। महंगाई तो बिल्कुल नहीं है।

 इलाज मुफ्त है, खाद्यान्न मुफ्त, सिलेंडर मुफ्त है। लोग सुरक्षित हैं। माताओं बहनों के खातों में रूपया जा रहा है। पेंशन की न टेंशन है। इस खेला में पेंशन ही पेंशन है।" जनता को आंकड़ों में खुश दिखाया जा रहा है, यह कुर्सी आंकड़े आंकड़े खेलती है, इसको आंकड़े आंकड़े खेलने की आदत है। आंकड़ों का खेला हो रहा है। नेताजी कह रहे हैं, ये हमारी कुर्सी बड़ी दमदार है जो "खेला पर खेला" कर रही है। अतः हे जन-जन ! तुम हमें खेला पर खेला करवाते रहो, हमारी बात "मन-मन" फैलाते रहो, आग पर आग लगाते रहो, आग न लगा सको तो केवल सुलगाते ही रहो, साथ ही, दूसरी पार्टी को "खदेड़ा होबे खदेड़ा होबे" कहकर डराते रहो। दूसरी पार्टी के समक्ष तुम "विकास विकास" चिल्लाओ, उनकी बातों में बिल्कुल भी नहीं आओ। हम कुर्सी पर बैठकर "आंकड़ों आंकड़ों" का खेल खेलते रहें हैं, ये हमारे पुरखों का प्रसिद्ध खेल रहा है, जिसे हमने "खेला" बना दिया है और हम लगातार इसे खेल रहे हैं। इसे हमें हमारे पुरखों ने सिखाया था। आप हमें खेलने दो, तफरी पर तफरी करने दो और मजे पर मजे मारने दो,क्योंकि हम तोड़ूफोड़ूकारी मानसिकता (विभाजन- सिभाजनकारी मानसिकता) के नहीं है। हम खेल को "खेला" बनाने वाले हैं और आपको पता है कि जब खेल में ही " तोड़ूफोड़ूकारी नीति"नहीं चलती तो "खेला" में भले कैसे चलेगी ? हम खेल में एक रहे हैं, तो खेला में क्या एक नहीं रहेंगे ? आप ही बताइएगा, हम ठीक बोल रहे हैं न ? बोल रहे हैं कि नहीं ?  ये विभाजन सिभाजन कारी की नीति तो "खदेड़ा" में चलती है और हम हमारी "खेला नीति" से सबको खदेड़ने की ताकत रखते हैं। ये हमने ही तो इस खेल को कुर्सी पर बैठकर खेल से "खेला" बनाया हैं। इसके नियम सियम, अजी रूल्स एंड रेगुलेशन बनाने वाले हम ही तो हैं। पास में दूसरा नेता खड़ा है, उसे कुर्सी पर बैठने का मौका नहीं मिल पा रहा है, वह जोगिंग करके काम चला रहा है, वह "हिंडोले" खाने के लिए बच्चे की तरह मचल रहा है । वह भी "खेला" की ताक में है। लेकिन "खेला" उसके वश में नहीं है। अजी ! वह निरंतर कुर्सी की ताक में है, भले ही वह उसके वश में नहीं है।  इसीलिए कुर्सी के हत्थे को ही हथियाने के लिए घोषणाओं पर घोषणाएं कर रहा है।

 हत्था पकड़कर वह कुर्सी हथिया लेगा, क्योंकि उसने भी कभी उंगली पकड़कर हाथ पकड़ने की कला सीखी थी। अब वह लगातार हाथ पकड़ने की फिराक में है। यही कारण है कि आटा फ्री,दाल फ्री,चावल फ्री,तेल फ्री, रेल फ्री, टोल फ्री,टेंशन फ्री, पेंशन फ्री और न जाने क्या क्या फ्री करने कराने की अनेकों घोषणाएं उसके घोषणापत्र में है। कुर्सी के साथ खड़ा होकर वह चिल्ला रहा है - आइए मेहरबान, आइए कद्रदान "खेला" शुरू हो चुका है। उसके घोषणा पत्र में अनेक संकल्प हैं। यह संकल्प "खेला का संकल्प" है। वह बार बार कह रहा है, दोहरा रहा है कि हमने ऐसा "खेला" बरसों पहले खेल-खेलकर छोड़ दिया है। हम खेला के सबसे माहिर खिलाड़ी हैं। बेचारी जनता बैचेन हैं। जनता के पास आजकल दोनों तरफ "खेला" देखने का ऑप्सन  है। वह सोच रही है कि वह जाए तो किधर जाए ? यह प्रश्न उसके समक्ष यक्ष प्रश्न है। जनता सोच रही है कि वह किसका खेला करे और किसका खदेड़ा ?

( ये लेखक के अपने विचार हैं, आर्टिकल का उद्देश्य पाठकों का स्वस्थ मनोरंजन करने तक सीमित है, किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना इस आर्टिकल का उद्देश्य नहीं है।)

सुनील कुमार महला,
स्वतंत्र लेखक व साहित्यकार