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जब देश में थी दीवाली....! (23 मार्च विशेष)




23 मार्च का दिन शहीदों को याद करने का दिन है, इस दिन को याद कर हर किसी की आंखें एकबारगी नम हो जाती हैं लेकिन दिल हमेशा इन शहीदों पर फ़क्र करता है और करता रहेगा। तेईस मार्च का दिन वह दिन है, जिस पर हर किसी की जुबां पर जगदंबा प्रसाद मिश्र 'हितैषी' की कविता 'शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले' की याद लाजिमी है। कविता की पंक्तियों को जऱा आप भी देखिए और महसूस कीजिए-'उरूजे कामयाबी पर कभी हिंदोस्ताँ होगा।रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा।।चखाएँगे मज़ा बर्बादी-ए-गुलशन का गुलचीं को।बहार आ जाएगी उस दम जब अपना बाग़बाँ होगा।


ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ ख़ंजर-ए-क़ातिल।पता कब फ़ैसला उनके हमारे दरमियाँ होगा॥जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़।न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ औ तू कहाँ होगा॥वतन के आबरू का पास देखें कौन करता है।सुना है आज मक़तल में हमारा इम्तहाँ होगा॥शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले।वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा।।कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे।जब अपनी ही ज़मीं होगी और अपना आसमाँ होगा॥'जगदंबा प्रसाद मिश्र जी ने उक्त पंक्तियां वर्ष 1916 में लिखी थी, पर समय भी देश के वीर सपूतों, आजादी के मतवालों,दीवानों को लेकर व्यक्त की गई इन भावनाओं को आज तक भी धुंधला नहीं पाया है और ये हमारे मानस पटल पर आज तक अंकित हैं।भारतीय इतिहास में 23 मार्च का दिन बहुत ही महत्वपूर्ण व बड़ा दिन है। 


क्यों कि तेईस मार्च को प्रत्येक वर्ष शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। वैसे तीस जनवरी को भी हम शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं। 30 जनवरी को नाथूराम गोडसे नामक व्यक्ति ने भारत के राष्ट्र पिता महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी, जबकि 23 मार्च 1931 को भारत के सपूतों और महान क्रांतिकारियों शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने हंसते हंसते फांसी की सजा को अपने गले लगा लिया था। भारतीय इतिहास में ये दोनों ही दिवस अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण इसलिए हैं क्योंकि इन दोनों दिवसों पर भारत की आन-बान और शान, भारत के गौरव, इसके कल्याण और इसकी आजादी के लिए लड़ते हुए हमारे देश के वीर सपूतों, महापुरुषों ने अपने प्राणों की आहूति तक दे दी थी। आज की युवा पीढ़ी को शायद यह जानकारी नहीं होगी कि इनको तय दिन और समय से 11 घंटे पहले ही अंग्रेजों द्वारा फांसी पर चढ़ा दिया गया था। भगतसिंह आजादी के कितने बड़े दीवाने थे इस बात का पता मात्र इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने माता-पिता से कहा था कि “अगर गुलाम भारत में मेरी शादी होगी तो मेरी दुल्हन मौत होगीl” इसके बाद वह “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” में शामिल हो गए थे। भगतसिंह ने जेल में रहते हुए 116 दिनों तक उपवास किया था और आश्चर्य की बात है कि इस दौरान् उन्होंने अपने दैनिक जीवन के सभी कार्य पढ़ना-लिखना, गायन इत्यादि को जारी रखा।

 
भगतसिंह हंसते हंसते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए थे। कहते हैं कि जब भगतसिंह की मां जेल में उनसे मिलने आई थी तो भगत सिंह जोरों से हँस पड़े थेl यह देखकर जेल के अधिकारी भौचक्के रह गए थे कि यह कैसा व्यक्ति है जो मौत के इतने करीब होने के बावजूद खुले दिल से हँस  रहा है। जानकारी मिलती है कि फांसी पर जाने से पहले तक भी वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे।वास्तव में, भगतसिंह का फांसी पर निडरता के साथ हंसते हुए झूलना ब्रिटिश साम्राज्यवाद को नीचा दिखाना था। एक जगह पर भगतसिंह लिखते हैं-'मेरे जज्बातों से इस कदर वाकिफ हैं मेरी कलम।मैं इश्क भी लिखना चाहूँ तो भी, इंकलाब लिख जाता हैं।।' भगतसिंह ने अपने अति संक्षिप्त जीवन(28 सितंबर 1907- 23 मार्च 1931) में वैचारिक क्रांति की जो मशाल जलाई थी, उनके बाद अब किसी के लिए संभव न होगी। असेंबली में बम फेंकने के बाद उन्होंने पर्चों में यह लिखा था कि-''आदमी को मारा जा सकता है उसके विचार को नहीं। बड़े साम्राज्यों का पतन हो जाता है लेकिन विचार हमेशा जीवित रहते हैं और बहरे हो चुके लोगों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज जरूरी है।' वास्तव में असेंबली में बम फेंकने के पीछे उनका उद्देश्य किसी प्रकार का खून-खराबा करना नहीं अपितु अंग्रेजी शासन तक अपनी आवाज़ को पहुंचाना था। जानकारी देना चाहूंगा कि भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय असेम्बली में एक खाली स्थान पर बम फेंका था। इसके बाद उन्होंने स्वयं गिरफ्तारी देकर अपना संदेश दुनिया के सामने रखा था। उनकी गिरफ्तारी के बाद उन पर एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेपी साण्डर्सकी हत्या में भी शामिल होने के कारण देशद्रोह और हत्या का मुकदमा चलाया गया था।जानकारी देना चाहूंगा कि सुखदेव ने ही भगत सिंह को असेम्बली हॉल में बम फेंकने के लिए राजी किया था। 

सुखदेव द्वारा भगत सिंह को कायर एवं डरपोक कहने के बाद भगतसिंह ने खुद असेम्बली हॉल में बम फेंकने का निर्णय लिया था। सुखदेव बहुत ही सहनशील, अनुशासनात्मक व कठोर थे और इस बात का पता इससे चलता है कि एक बार सुखदेव ने अपने बाएं हाथ पर छपे एक टैटू को निकलने के लिए उस नाइट्रिक एसिड डाल दिया था और उस घाव को मोमबत्ती की लौ के सामने रख दिया था। बहुत कम लोग यह बात जानते होंगे कि राजगुरू का पूरा नाम शिवराम हरी राजगुरू था। उन्होंने संस्कृत और विभिन्न हिन्दू धार्मिक शास्त्रों का गहन अध्ययन किया था और वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी यानी कि एचएसआरए के एक्टिव सदस्य थे, जिसका लक्ष्य भारत को किसी भी तरह से ब्रिटिश शासन से मुक्त करना था। ऐसी जानकारी मिलती है कि राजगुरू शिवाजी और उनकी गुरिल्ला युद्ध पद्धति से काफी प्रभावित थे। जानकारी मिलती है कि राजगुरु लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से भी काफी हद तक प्रभावित थे। पुलिस की बर्बर पिटाई से लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए राजगुरु ने 19 दिसंबर, 1928 को भगत सिंह के साथ मिलकर लाहौर में अंग्रेज सहायक पुलिस अधीक्षक जेपी सांडर्स को गोली मार दी थी और खुद ही गिरफ्तार हो गए थे। राजगुरु को भगतसिंह की पार्टी के लोग 'गनमैन' के नाम से जानते थे। सच तो यह है किभगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव मां भारती के वे सच्चे सपूत थे, जिन्होंने अपनी देशभक्ति, अपने जज्बे और देशप्रेम को अपने प्राणों से भी अधिक महत्व दिया था और मातृभूमि(इस भारतभूमि) के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए थे। देश की आजादी के लिए लड़ते हुए अपने प्राणों को हंसते-हंसते न्यौछावर करने वाले तीन वीर सपूतों का शहीद दिवस 23 मार्च इन उज्ज्वल चरित्रों को याद करने, इन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने का दिन है। सच तो यह है कि इन तीनों शहीदों ने अपनी शहादत देकर अंग्रेजी हुकूमत के आसमान में भी सुराख कर दिया था। शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से ही आज हम आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं। उनके देश के प्रति जज्बे, देशभक्ति को चंद शब्दों में बयां करना यहाँ संभव नहीं है। उन्हें सलाम, शत शत नमन, विनम्र श्रद्धांजलि। अंत में रामप्रसाद बिस्मिल के शब्दों में यही कहूंगा कि-'अजल से वे डरें जीने को जो अच्छा समझते हैं। मियाँ! हम चार दिन की जिन्दगी को क्या समझते हैं?'

(आर्टिकल का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।)


सुनील कुमार महला,
स्वतंत्र लेखक व युवा साहित्यकार