बस थोड़ा टोका-टाकी की आदत नहीं होने के कारण थोड़ा पिछड़ रहे हैं। अजी ! इस देश-दुनिया में कम ही लोग हैं जो गलत काम करने वालों को टोकते होंगे ? अब आप देखिए न, झगड़ूराम जी डोर टू डोर कचरा कलेक्शन का काम करते हैं लेकिन खुद सारा दिन "पिचर पिचर घिचर मिचर" करते रहते हैं। कचरा बाद में उठाते हैं, पहले कचरे के ढ़ेर पर जोर से थूकते हैं। अजी ! बेचारे पान-सान खाने के बड़े शौकीन हैं। अब ऐसे लोग शहर को चकाचक बनाने में अपना खूब योगदान दे रहे हैं। थूकने में इन्होंने मास्टरडिग्री हासिल कर रखी है। ये चलते चलते, उठते बैठते, खांसते छींकते, बोलते बुलाते जब मन चाहे, जहाँ चाहे अपने थूक से दीवार, धरती सबको सरोबार कर देते हैं। सफेद दीवारें तो ऐसे लगतीं हैं जैसे ये दीवारें अपने जन्म जन्मान्तर में भी कभी सफेद नहीं रहीं होंगी।
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विभिन्न स्थानों पर बने व्हाइट कमोड,वॉश बेसिन ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे इन्हें ब्राउनिश बनाया गया हो। खैर, हमें तो कई बार ऐसे तक महसूस होता है कि इन थूकेरा प्रेमियों को होली जैसे त्योहार पर रंगों-वंगों की जरूरत ही नहीं पड़ती होगी। भैया जी ! ये माना कि पान खाना हमारे खान-पान,व्यवहार, संस्कृति में शामिल है, पान में रस होता है, भोजन का पाचन भी अच्छा हो जाता है, लेकिन हमें लगता है कि लोग पान कम "गुटखा सुटखा" ज्यादा गटकते हैं, खाते हैं। कुछ लोग तो एक साथ अपने मुंह में पांच-सात पान एकसाथ घुसेड़ लेते हैं, यह ठीक वैसे ही है जैसे चुनाव होने के तुरंत बाद लोग पैट्रोल डीजल को(महंगाई के कारण) बड़ी बड़ी टंकियों में घुसेड़ रहे थे। गुटखा,खैनी, तंबाकू युक्त पदार्थ खाकर ये ऐसी पिचकारी मारते हैं कि इनके आगे रूस यूक्रेन की मिसाइलें भी फेल हो जाती हैं। उस दिन पुतिन जी ने रामलुभाया जी से फोन पर वार्तालाप करते हुए कुछ "थूकेरे" उनके देश में भेजे जाने हेतु निवेदन किया था, क्योंकि इन "नाटों साटों" वालों ने उनकी नाक में दम कर रखा है। पुतिन जी अब इन "सिद्धहस्त थूकेरो" की सहायता से यूक्रेन के साथ युद्ध लड़ेंगे, क्योंकि इन सिद्धहस्त थूकेरो(थूकने थुकाने में सिद्धहस्त,महारथहासिल) के पास "थूकी गोले बम" जो फादर आफ आल बम है, मौजूद हैं। यूक्रेन को तो वे थूक-थूक कर भगा देंगे, थका देंगे। वो क्या है कि हमारे यहाँ के थूकेरो का थूक "सुपरसोनिक थूक" है। अजी ! सुपरसोनिक थूक, नहीं जाए कोई चूक। इस थूक की गति इतनी तेज होती है कि चलती बस या ट्रेन से यह कभी भी किसी को भी अपनी लपेट चपेट में ले सकता है और आदमी इसकी चोट से उबर नहीं सकता। कपड़ों पर इस थूक की मिसाइल गिर जाए तो "घिस मेरे नंदन..चंदन...घिस मेरे नंदन...चंदन" ही होता रहता है। बेचारा कपड़ा-लत्ता घिसते घिसते घिस जायेगा, फट जाएगा लेकिन थूक मिसाइल का दाग परमानेंट ही रहेगा। हमें लगता है लोगों का पानवा से ज्यादा इंटरेस्ट "तंबाकूवा" युक्त जर्दा,खैनी खाने में अधिक है। तंबाकू खा खाकर लोग इस देश में इतना थूकते हैं कि यदि इस थूक को इकट्ठा किया जाए तो यह कई मीट्रिक टन हो सकता है।
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खैर आजकल लोगों का इंटरस्ट पान खाने में कम कश्मीर फाइल्स में ज्यादा है। होना भी चाहिए। लोग आजकल "द कश्मीर फाइल्स" देख रहे हैं, अजी देखिए, जरूर देखिए, अच्छी मूवी है, विवेक अग्निहोत्री के निर्देशन में बनी फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया है। इस देश में लोगों ने थूक थूक कर तहलका मचा रखा है तो इधर कश्मीर फाइल्स तहलका मचाए हुए है। खैर, जो भी हो, तहलका मचना ही था, क्योंकि "द कश्मीर फाइल्स" 1990 में कश्मीरी पंडितों द्वारा कश्मीर विद्रोह के दौरान सहे गए क्रूर कष्टों की सच्ची कहानी है, जो कश्मीरी पंडित समुदाय के कश्मीर नरसंहार के पीड़ितों के वीडियो साक्षात्कार पर आधारित है। यह कश्मीरी पंडितों के दर्द, पीड़ा, संघर्ष और आघात का दिल दहला देने वाला आख्यान है। इस फिल्म में अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती ने अच्छा अभिनय कर अपनी छाप छोड़ी है लेकिन भैया जी छाप तो हमारे देश के लोग भी "पिचर पिचर,किचर किचर" करके सार्वजनिक दीवारों, सार्वजनिक टायलेट्स, भवनों, सिनेमा हॉल्स,मल्टीप्लेक्स, पार्कों, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और न जाने कहाँ कहाँ छोड़ रहे हैं ? इस थूक ने भी हिट पर हिट दिए हैं।अजी ! इतने हिट वाले इस थूक सूक पर हम तो कहते हैं कि " ए मिशन अगेंस्ट अनसिविलाइज्ड थूक " नाम से भी एक मूवी जरूर बनाई जानी चाहिए। क्या पता इससे थूकने वालों का दर्द, पीड़ा और संघर्ष सामने आ जाए ? हो सकता है कि थूकने वाले ये महाशय थूकने सूकने के लिए डस्टबिन वस्टबिन की मांग कर लें। ये मांग थूक की क्वालिटी के अनुसार केटेगरीवाइज हो सकती है, जैसे चवन्नी टाइप थूक, रूपया टाइप थूक, गीला थूक, थोड़ा कम गीला थूक, सूखा थूक, भूरभूरा थूक, अटपटा थूक, चटपटा थूक, डायलूटेड थूक, नॉटडायलूटेड थूक, हाइब्रिड थूक, देसी थूक,विदेशी थूक, थूक ही थूक वगैरह वगैरह। बहरहाल, तोताराम जी को साफ सफाई पर चर्चा के दौरान थूक के बारे में बताते बताते इस लेखक का सारा थूक सूख गया। तोताराम जी को हमारे द्वारा बताई गई "थूक स्टोरी" अच्छी लग रही थी लेकिन हमने तोताराम जी से इस थूक स्टोरी को बीच में छोड़ने के लिए ब्रेक मांगा और तोताराम जी को उनके यथास्थान पर छोड़कर औरों की तरह हम भी "तंबाकूवा युक्त पानवा सानवा" खाने निकल गए, क्योंकि हमें भी बिना पिचर पिचर,किचर किचर किए आर्टिकल लिखने लिखाने में मजा नहीं आता है। क्यों जी ? हमने ठीक कहा कि नहीं ? आप ही बताएं आपको हमारी यह "किचर किचर, पिचर पिचर" कैसी लगी ? अच्छी लगी तो ठीक है और यदि अच्छी नहीं लगी तो आप भी हमारे इस आर्टिकल पर "किचर पिचर धिचर फिचर" आपके जो मन में आए, जितना मन में आए, थूक सकते हैं। गुस्ताखी माफ ! वैसे थूकना कोई महानता का काम नहीं है, असभ्य होने की निशानी है। अजी ! आप इधर उधर थूका मत करें, नहीं तो असभ्य कहते हुए लोग आप पर भी कभी भी थूक सकते हैं। माफ करिएगा,ग़र बुरा लगा हो तो। हम भी न, यूं ही बकते सकते रहते हैं। जय राम जी की।
( आर्टिकल का उद्देश्य पाठकों का स्वस्थ मनोरंजन करने तक सीमित है, किसी की भावनाओं को आहत करना व ठेस पहुंचाना इस आर्टिकल का उद्देश्य नहीं है, अतः पाठक अपने स्वस्थ मनोरंजन मात्र हेतु इसे पढ़ें।)
सुनील कुमार महला,
स्वतंत्र लेखक व साहित्यकार
