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महान राष्ट्रभक्त, स्वाभिमानी शूरवीर यौद्धा महाराणा प्रताप

 महाराणा प्रताप जयंती (9 मई,) पर विशेष


महान राष्ट्रभक्त, स्वाभिमानी शूरवीर यौद्धा महाराणा प्रताप

राजपूत शिरोमणी सिसोदिया वंश के सूर्यवंशी मेवाड़ के वीर यौद्धा महाराणा प्रताप का शौर्य और त्याग अविस्मरणीय है। उनकी वीरता के किस्से घर-घर में सुनाये जाते हैं। महाराणा प्रताप मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए कभी नहीं झुकने वाले स्वाभिमानी महान यौद्धा थे, जिन्होंने जीवन की आखिरी सांस तक विशाल मुगल साम्राज्य से जंग की। उनका जन्म महाराणा उदय सिंह - माता महारानी जयवंता कंवर के घर राजस्थान के कुंभलगढ़ में हुआ। उनकी जयंती विक्रमी संवत कैलेण्डर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। उन्हें बचपन में ‘कीका’ नाम से पुकारा जाता था। महाराणा प्रताप अद्वितीय बुद्धिमता एवं वीरता की मिसाल हैं। महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलो और कवच का वजन भी 80 किलो था। उनकी तलवार व कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं।
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मेवाड़ की शौर्य भूमि धन्य है। जहां वीरता और दृढ़ प्रण वाले प्रताप का जन्म हुआ, जिन्होंने इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया। उन्होंने धर्म एवं स्वाधीनता के लिये अपना बलिदान दिया। राणा प्रताप को जात-पंथ की सीमा में नहीं बांधा जा सकता।
मेवाड़ की प्रजा का महाराणा प्रताप से अटुट प्रेम था। मेवाड़ की प्रजा अपनी सीमित आय में से एक निश्चित राशि महाराणा के पास जमा कराती थी, जिसका उपयोग सुरक्षा व्यवस्था में किया जाता था। महाराणा ने प्रजा को यह बात स्पष्ट कर दी थी कि न कोई राजा है और न कोई प्रजा है, सभी अपनी मातृभूमि के सेवादार हैं। हमें एक वीर की तरह लड़ाई लडक़र चित्तौडग़ढ़ की रक्षा करनी है, यह हमारा प्रमुख ध्येय है।
महाराणा प्रताप पराक्रमी, साहसी व शूरता के प्रतीक थे, जिन्होंने गुलामी के प्रति स्वतंत्रता की अलख जगाई। वे एक स्वाभिमानी व त्यागी पुरूष थे, जिन्होंने जुल्म के खिलाफ इंसानियत का युद्ध लड़ा तथा यह प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक मेवाड़ आजाद नहीं होता, वे महलों में नहीं रहकर जंगलों में रहेंगे। इसी प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये उन्होंने राजसी भोजन व सुख-चैन को त्यागकर घास की रोटी खाकर जीवन गुजारा तथा मेवाड़ को बचाने के लिये अपनी आन-बान-शान को दांव पर लगा दिया।
महाराणा प्रताप महान पितृभक्त भी थे। उनके पिताश्री राणा उदयसिंह महाराणा प्रताप की जगह अपने छोटे पुत्र जगमल को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करना चाहते थे। महाराणा प्रताप की अपने पिता के प्रति बहुत श्रद्धा थी, इसलिये महाराणा प्रताप पिताश्री के निर्णय को मानते हुए चित्तौड़ छोडक़र जंगल मेें चले गये तथा तकलीफों को झेलते रहे, परन्तु पिताश्री की आज्ञा का विरोध नहीं किया।
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अकबर राजनीतिक दांव-पेच जानता था, इसलिये वह राजपूतों को अपने लिये इस्तेमाल करने में सफल रहा तथा महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्ति सिंह को उसने अपने साथ मिलाकर महाराणा प्रताप से युद्ध किया। अकबर ने शक्ति सिंह से महाराणा प्रताप की मेवाड़ सैन्य शक्ति का भेद ले लिया कि प्रताप के पास कुल 20-22 हजार सैनिक हैं। इनमें भीलों की संख्या अधिक है। भील जो जंगली जति होती है, जो पहाड़ों व गुफाओं में छुपकर तीरंदाजी करते हैं। वे अपने शत्रुओं पर बिजली की गति से आक्रमण करते हैं तथा शत्रुओं को अपने बाणों से घायल कर अचानक गुम हो जाते हैं।  
सन् 1576 ई. में 18 जून को हल्दीघाटी युद्ध में 20 हजार राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह की 80 हजार सेना का सामना किया। शत्रु सेना में शक्ति सिंह ने भी साथ दिया। उनके सबसे प्रिय और प्रसिद्ध नीलवर्ण अरबी मूल के घोड़े का नाम ‘चेतक’ था। हल्दीघाटी के युद्ध में उनके प्रिय घोड़े चेतक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसे आज भी याद किया जाता है।  शत्रु सेना से घिर जाने के बाद महाराणा प्रताप का घोड़ा ‘चेतक’ 26 फीट की खाई पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ। उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह खाई पार कर गया। महाराणा प्रताप के घोड़े का मंदिर भी बना हुआ है, जो हल्दीघाटी में सुरक्षित है। हल्दीघाटी युद्ध केवल एक दिन चला, परन्तु इसमें 17 हजार लोग मारे गये।
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मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये, परन्तु महाराणा ने अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कई वर्षों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। उन्होंने हिन्दू महिलाओं की रक्षा की। उनकी जीवनी पर लिखी कवितायें मृत दिलों में जान डाल देती है तथा देश भक्ति का भाव उजागर करती है।
राजपुती खुन रगों में है, हुँ भुख मरूं हुँ
प्यास मरूं मेवाड़ की धरती आबाद रहे
इसी प्रकार से इस महान मेवाड़ के महाराणा पर पं. नरेन्द्र मिश्र की कविता की कुछ पंक्तियां उनकी शूरवीरता को बयान करती हैं। राणा प्रताप इस भारत भूमि के मुक्ति मंत्र का गायक है। राणा प्रताप आजादी का अपराजित काल विधायक है। राणा प्रताप की खुद्दारी भारत माता की पूंजी है। यह वो धरती है, जहां कभी चेतक की टापें गूंजी है।
महाराणा प्रताप की मृत्यु 19 जनवरी, 1597 में हुई। उनकी मृत्यु पर सम्राट अकबर को भी बहुत दुख हुआ तथा उसकी आँखों में आंसू आ गये। आज महाराणा प्रताप हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका बाहुबल आज भी जनमानस के दिलो-दिमाग में बसा हुआ है। महाराणा प्रताप केवल भारत के लिये ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिये प्रेरणादायक है। मेवाड़ की धरती को मुगलों से बचाने वाले ऐसे महान् वीर सम्राट, शुरवीर, राष्ट्रगौरव, पराक्रमी, साहसी, राष्ट्रभक्त को पूरा राष्ट्र शत्-शत् नमन् करता है। उनकी पितृभक्ति, देशभक्ति, वीरता व शौर्य की गाथा युगों-युगों तक गाई जायेगी।