Communicate with letters even in the digital age! डिजिटल युग में भी करें पत्रों से संवाद !
आज डिजिटल तकनीक का युग है। इंटरनेट, सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम का युग है। यही कारण है कि आज हम पत्रों से संवाद करना लगभग लगभग भूल चुके हैं। आज की युवा पीढ़ी डाकघर में मिलने वाले अंतर्देशीय पत्र, पोस्टकार्ड आदि के बारे में जानती ही नहीं होगी। आज सब टेक्स्ट मैसेज लिखते हैं, व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम का जमकर प्रयोग करते हैं लेकिन पत्र लिखने में जो भावनाएं मौजूद थीं, जिस भाषा का हम पत्रों में इस्तेमाल करते थे, आज वह भाषा, भावनाएं दोनों ही नदारद हो गई हैं। आज पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों को कोई विरले ही चिट्ठी लिखता होगा।
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वैसे भी आज के इंटरनेट, आधुनिक युग में किसी संपादक के पास इतना समय नहीं होता है कि वह पाठकों, लेखकों की एक एक चिट्ठियाँ खोलकर पढ़ें और बाद में उन्हें अपने अखबार में प्रकाशित करें। पहले संपादकों द्वारा पाठकों, लेखकों की चिट्ठियों को लंबे समय तक संभाल कर रखा जाता था और बहुत बार तो चिट्ठियां महीनों के अंतराल पर अखबार में प्रकाशित होती थी, जिसका आनंद ही कुछ और था। आज फटाफट का जमाना है। एक ही दिन में एक अखबार के पास सैकड़ों, हजारों ई मेल आते हैं, लिखा बहुत जा रहा है लेकिन इस प्रकार के लेखन से भावनाएं गायब हैं। पहले के जमाने में संदेश पहुंचाने का सबसे बेहतरीन माध्यम पत्र थे,
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लेकिन आज की युवा पीढ़ी इंटरनेट, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर तो आसानी से लिख सकती है लेकिन यदि उसे हाथ में अंतर्देशीय पत्र या पोस्टकार्ड थमा दिया जाए तो उसके वश की बात नहीं कि वह पत्र लिखकर अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सके। सच तो यह है कि आज हमने लिखने-लिखाने की कला को खो दिया है। हम भावों को व्यक्त करते हैं लेकिन 'इमोजी' का प्रयोग करके। मुझे नहीं लगता है कि आज की युवा पीढ़ी कभी पोस्ट आफिस जाकर अंतर्देशीय पत्र, पोस्टकार्ड इत्यादि की मांग करती होगी। अब तो चिट्ठियां भी कम ही आतीं हैं, क्योंकि लिखने वाले नहीं बचे हैं, अथवा चिट्ठियां लिखने वालों की संख्या में अभूतपूर्व कमी आ गई है। पहले के जमाने में लोग डाकिए का बेसब्री से इंतजार करते थे, वह बैग लटकाये अपनी साईकिल से आता था और घर-घर चिट्ठियां बांटता था, सेना के लोग तो पहले रेडियो व चिट्ठियों पर ही (मनोरंजन, संदेश पहुंचाने) के लिए आधारित थे। चिट्ठियां लिखने-लिखाने का बड़ा प्रचलन था, महत्व था। छोटी कक्षाओं से ही बच्चों को चिट्ठी लिखना सिखाया जाता था, आज शायद नहीं अथवा बहुत ही कम। शायद यही कारण भी है कि आज हमारे पास शब्दों का भंडार भी कम हो गया है। इंटरनेट, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, टेक्स्ट मैसेज हम आज शॉर्टकट में लिखते हैं। हम सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने मैसेज को आज दूसरों को 'कनवे' करते हैं, पूरे शब्द विरले ही लिखते हैं, इससे हमारी भाषा शैली पर भी काफी प्रभाव पड़ा है।
आज मोबाइल, लैपटॉप में आटो करैक्टर फीचर मौजूद हैं, स्पेलिंग्स अपने आप आटोमैटिक रूप से करेक्ट या ठीक हो जाती हैं। इससे हमारी वर्तनी कमजोर हो रही है, हम शुद्ध-अशुद्ध में फर्क नहीं कर पा रहे हैं, बहुत से मायनों में हम गलत या अशुद्ध ही लिख रहे हैं। आज सबकुछ हमारे मोबाइल, लैपटॉप की मैमोरी में सेव हो रहा है, पहले संपादक, घर के सदस्य, सेना के जवान सभी पत्रों को बहुत ही चाव से सहेज कर रखते थे, आज ऐसा करने का न तो किसी के पास समय रहा है और न ही ऐसे कार्यों में किसी की रूचि ही रही है। तकनीक के साथ ही आज संदेश भेजने के तरीकों में आमूल चूल परिवर्तन आ चुके हैं। इंटरनेट और मोबाइल के जमाने में क्या हमें पत्र-लेखन से दूर हो जाना चाहिए ? या आज नये जमाने के साथ चलते हुए तकनीक का उपयोग करना चाहिए ? तकनीक का उपयोग बुरा नहीं है लेकिन हमें पत्र-लेखन की कला तो आनी ही चाहिए, क्यों कि जो बात पत्र-लेखन में है, वह बात इंटरनेट, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लेखन में नहीं हो सकती है।
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पत्र-लेखन का अपना महत्व व फायदे हैं। पत्र लेखन एक बहुत बड़ी कला है। पत्रों के माध्यम से हम हमारी भावनाओं, हमारे विचारों, हमारी अंदरूनी बातों को काग़ज़ के कैनवास पर उतारते हैं। पत्रों में अपने पन का अहसास होता है जो कि आधुनिक तकनीक में कभी नहीं हो सकता है। सच तो यह है कि आजकल पत्र लेखक को एक खोई हुई कला के रूप में जाना जाने लगा है। आप स्वयं को आज से बीच-पच्चीस बरस पहले के जमाने में ले जाइए आपको आज भी खत, डाकिये और खतों के इंतजार के लम्हे याद आयेंगे। आज संचार माध्यमों, वाट्सऐप, फेसबुक के चलन से पत्र लेखन का काम धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। हालांकि सरकारी कामों में इन पत्र लेखन का काम जिंदा है। अब डाक विभाग से कहीं चिट्ठियां आतीं हैं तो अधिकतर सरकारी चिट्ठियां ही आतीं हैं। साक्षात्कार के लिए भी आजकल ई-मेल से मैसेज आने लगे हैं, जमाना पूरी तरह से बदल गया है। वर्तमान में संदेशों का आदान-प्रदान होता है, मगर जो जज्बात पत्र लेखन के समय उमड़ते थे, वह अब नदारद हो गए हैं। एक समय था जब डाकिया पत्र लेकर हमारे घर पहुंचता था तो हमें अपनों की यादें ताजा हो जाती थीं।
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आज संदेश व्यक्ति विशेष तक सीमित हो गए हैं, सबके पास एंड्रॉयड मोबाइल हैं, आज के संदेशों में परिवार की भावना नहीं होती। पहले चिट्ठियों को बारी-बारी से सभी पढ़ते थे। बच्चे पहले पत्र पढ़कर भाषा सीखते थे, वह पत्र की शैली का जाने-अनजाने में ही अध्ययन करते थे और पत्र लेखन सीख जाते थे। वो बड़ों की भावनाओं की अभिव्यक्ति का साकार रूप देख पाते थे, आजकल ऐसा नहीं है। संदेश व्यक्ति विशेष तक सीमित हैं। पत्र लेखन की उपयोगिता अथवा महत्व यह है कि किसी भी निजी अथवा व्यापारिक सूचनाओं को प्राप्त करने तथा भेजने के लिए पत्र व्यवहार विषय कारगर है। प्रेम, क्रोध, जिज्ञासा, प्रार्थना, आदेश, निमंत्रण आदि अनेक भावों को व्यक्त करने के लिए पत्र लेखन का सहारा लिया जाता है। आज युवाओं को औपचारिक, अनौपचारिक पत्रों के बारे में विशेष जानकारी विरले ही है। आज की युवा पीढ़ी शायद ही जानती हो कि औपचारिक पत्रों में व्यावसायिक, आधिकारिक, सामाजिक व रोजगार पत्र जबकि अनौपचारिक पत्रों में व्यक्तिगत जानकारी शामिल होती है। वास्तव में, इन्हें व्यक्तिगत पत्र के रूप में भी जाना जाता है। इस प्रकार का पत्र आम तौर पर दोस्तों या परिवारों को भावनाओं, समाचारों आदि को साझा करने के लिए लिखा जाता है। इन पत्रों के लिखने का कोई ठोस कारण हो भी सकता है और नहीं भी।
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औपचारिक पत्र में भेजने वाले का पता,तारीख, पत्र प्राप्त करने वाले का पता, विषय, अभिवादन, संदेश, विनम्रतापूर्वक समापन तथा सिग्नेचर लाइन आदि को शामिल किया जाता है।दूर रहने वाले अपने सगे- संबंधियों, रिश्तेदारों, दोस्तों, मित्रों की कुशलता जानने के लिए तथा अपनी कुशलता का समाचार देने के लिए, कोई भी संदेह पहुंचाने के लिए, सूचना के लिए पत्र एक महत्वपूर्ण साधन है। इसके अतिरिक्त्त अन्य कार्यों के लिए भी पत्र लिखे जाते है।सरकारी व निजी संस्थाओं के अधिकारियों को अपनी समस्याओं आदि की जानकारी देने के लिए पत्रादि लिखने पड़ते हैं। संचार क्रांति के युग में भले ही हम पत्र लेखन की कला को भुला दें, लेकिन पत्र-लेखन का महत्व कभी भी कम नहीं हो पाएगा। सच तो यह है कि पत्र-लेखन को हम अपने अतीत का हिस्सा न बनाएं, परीक्षा में मात्र अंक प्राप्त करने के लिए बच्चों को पत्र-लेखन न सिखाएं। पत्र हमारे भावों से जुड़े होते हैं, इसलिए हम पत्र-लिखकर अपने भावों को संजोए। पत्र लिखकर हम अपने अंदर आत्मविश्वास की भावनाएं जगा सकते हैं, अपने तनाव, डिप्रेशन को दूर कर सकते हैं। जीवन में आत्मबल को बढ़ा सकते हैं, सफलता, सहजता का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। शब्दों, भाषा शैली को बेहतरीन बना सकते हैं। अतः आइए हम पत्रों की दुनिया में लौटें।
सुनील कुमार महला,
स्वतंत्र लेखक व युवा साहित्यकार

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